संकष्टी चतुर्थी Sankashti Chaturthi, कब है, क्यों मनाते है, विशेष भोग , वैज्ञानिकता ,संभव, shambhav, शाम्भवी पाण्डेय
माघ मास में पड़ने वाले विविध पर्वो में संकष्टी चतुर्थी एक पौराणिक पर्व है। इसे बोलचाल की भाषा में 'संकट चौथ' या 'सकट' के नाम से जाना जाता है।
2022 में संकष्टी चतुर्थी कब मनाई जाएगी ?
माघ मास के कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी का विशेष महत्व है। इस बार यह पर्व 21 जनवरी 2022 दिन शुक्रवार को मनाया जाएगा ।
इस दिन चौथ माता (पार्वती) और पर विघ्नहर्ता गणेश की जल, अक्षत, दूर्वा, एक लड्डू, पान व सुपारी से विधि-विधान पूर्वक आराधना करने की लोक परंपरा है।
संकष्टी चतुर्थी क्यों मनाई जाती है?
संकटों का हरण करने वाली इस चतुर्थी पर्व को 'माघी चतुर्थी' और ‘तिलकुट चौथ' नाम से भी जाना जाता है।
शास्त्रीय मान्यता है कि इस निर्जला व्रत का अनुष्ठान
सर्वप्रथम मां पार्वती ने अपने पुत्र गणेश की मंगलकामना के लिए किया था। तभी से हिंदू धर्म की महिलाएं अपनी संतान की दीर्घायु और सुखी जीवन की कामना के साथ यह व्रत रखती आ रही हैं।
संकष्टी चतुर्थी में लगने वाला विशेष भोग क्या है?
शंकर सुवन भवानी नंदन गजानन को सामान्यतौर पर बेसन और मोतीचूर के लड्डू का भोग लगाया जाता है, लेकिन संकष्टी चतुर्थी पर उन्हें तिल के लड्डू ही चढ़ाए जाते हैं। दरअसल, इस प्राचीन परंपरा के पीछे आस्था और आहार का एक सुनियोजित विज्ञान समाहित है।
धर्म शास्त्रों में तिल को देवान्न की संज्ञा दी गयी है।
तिल की वैज्ञानिक उपयोगिता
देवान्न अर्थात् तिल की वैज्ञानिक उपयोगिता भी परीक्षणों में साबित हो चुकी है।
तिल एक बेहतरीन एंटीआक्सीडेंट माना गया है। साथ ही इसमें कापर, मैग्नीशियम, आयरन,कैल्शियम, फास्फोरस, जिंक, विटामिन और फाइबर भरपूर मात्रा में होता है, जो हमारी रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाने में अत्यंत सहायक होता है।
तिल के तेल से मालिश करने से हड्डियां मजबूत होती हैं और त्वचा में चमक आती है।
माघ में शीत की तीक्ष्णता के कारण ऋषि-मुनियों ने इस अवधि में गर्माहट व ऊर्जा देने वाले खाद्य पदार्थों के सेवन की परंपरा बनायी थी।
सकट पर तिल के लड्डू के प्रसाद के पीछे भी यही वैज्ञानिक आधार है।
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